गार्गी प्रकाशन प्रगतिशील और जनपक्षधर साहित्य के प्रकाशक व वितरक

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  • गोरख पाण्डेय

    तटस्थ के प्रति

     चैन की बाँसुरी बजाइये आप

    शहर जलता है और गाइये आप

    हैं तटस्थ या कि आप नीरो हैं

    असली सूरत ज़रा दिखाइये आप
    (रचनाकाल :1978)

     

    उनका डर

     
    वे डरते हैं

    किस चीज़ से डरते हैं वे

    तमाम धन-दौलत

    गोला-बारूद पुलिस-फ़ौज के बावजूद ?

    वे डरते हैं

    कि एक दिन

    निहत्थे और ग़रीब लोग

    उनसे डरना

    बंद कर देंगे ।
    (रचनाकाल:1979)

     

    कला कला के लिए

     

    कला कला के लिए हो
    जीवन को ख़ूबसूरत बनाने के लिए
    न हो
    रोटी रोटी के लिए हो
    खाने के लिए न हो

    मज़दूर मेहनत करने के लिए हों
    सिर्फ़ मेहनत
    पूंजीपति हों मेहनत की जमा पूंजी के
    मालिक बन जाने के लिए
    यानि,जो हो जैसा हो वैसा ही रहे
    कोई परिवर्तन न हो
    मालिक हों
    ग़ुलाम हों
    ग़ुलाम बनाने के लिए युद्ध हो
    युद्ध के लिए फ़ौज हो
    फ़ौज के लिए फिर युद्ध हो

    फ़िलहाल कला शुद्ध बनी रहे
    और शुद्ध कला के
    पावन प्रभामंडल में
    बने रहें जल्लाद
    आदमी को
    फाँसी पर चढ़ाने लिए.

    वतन का गीत

    हमारे वतन की नई ज़िन्दगी हो
    नई ज़िन्दगी इक मुकम्मिल ख़ुशी हो
    नया हो गुलिस्ताँ नई बुलबुलें हों
    मुहब्बत की कोई नई रागिनी हो
    न हो कोई राजा न हो रंक कोई
    सभी हों बराबर सभी आदमी हों
    न ही हथकड़ी कोई फ़सलों को डाले
    हमारे दिलों की न सौदागरी हो
    ज़ुबानों पे पाबन्दियाँ हों न कोई
    निगाहों में अपनी नई रोशनी हो
    न अश्कों से नम हो किसी का भी दामन
    न ही कोई भी क़ायदा हिटलरी हो
    सभी होंठ आज़ाद हों मयक़दे में
    कि गंगो-जमन जैसी दरियादिली हो
    नये फ़ैसले हों नई कोशिशें हों
    नयी मंज़िलों की कशिश भी नई हो.

     

    सपना

    सूतन रहलीं सपन एक देखलीं

    सपन मनभावन हो सखिया,

    फूटलि किरनिया पुरुब असमनवा

    उजर घर आँगन हो सखिया,

    अँखिया के नीरवा भइल खेत सोनवा

    त खेत भइलें आपन हो सखिया,

    गोसयाँ के लठिया मुरइआ अस तूरलीं

    भगवलीं महाजन हो सखिया,

    केहू नाहीं ऊँचा नीच केहू के न भय

    नाहीं केहू बा भयावन हो सखिय,

    मेहनति माटी चारों ओर चमकवली

    ढहल इनरासन हो सखिया,

    बैरी पैसवा के रजवा मेटवलीं

    मिलल मोर साजन हो सखिया ।
    (रचनाकाल : 1979)

    वोट

    पहिले-पहिल जब वोट मांगे अइले
    तोह्के खेतवा दिअइबो
    ओमें फसली उगइबो ।
    बजडा के रोटिया देई -देई नुनवा
    सोचलीं कि अब त बदली कनुनवा।
    अब जमीनदरवा के पनही न सहबो,
    अब ना अकारथ बहे पाई खूनवा।

    दुसरे चुनउवा में जब उपरैलें त बोले लगले ना
    तोहके कुँइयाँ खोनइबो
    सब पियसिया मेटैबो
    ईहवा से उड़ी- उड़ी ऊंहा जब गैलें
    सोंचलीं ईहवा के बतिया भुलैले
    हमनी के धीरे से जो मनवा परैलीं
    जोर से कनुनिया-कनुनिया चिलैंले ।

    तीसरे चुनउवा में चेहरा देखवलें त बोले लगले ना
    तोहके महल उठैबो
    ओमें बिजुरी लागैबों
    चमकल बिजुरी त गोसैयां दुअरिया
    हमरी झोपडिया मे घहरे अन्हरिया
    सोंचलीं कि अब तक जेके चुनलीं
    हमके बनावे सब काठ के पुतरिया ।

    अबकी टपकिहें त कहबों कि देख तूं बहुत कइलना
    तोहके अब ना थकईबो
    अपने हथवा उठईबो
    हथवा में हमरे फसलिया भरल बा
    हथवा में हमरे लहरिया भरलि बा
    एही हथवा से रुस औरी चीन देश में
    लूट के किलन पर बिजुरिया गिरल बा ।
    जब हम ईंहवो के किलवा ढहैबो त एही हाथें ना
    तोहके मटिया मिलैबों
    ललका झंडा फहरैबों
    त एही हाथें ना
    पहिले-पहिल जब वोट मांगे अइले ….
    समझदारों का गीत

     

    हवा का रुख कैसा है,हम समझते हैं
    हम उसे पीठ क्यों दे देते हैं,हम समझते हैं
    हम समझते हैं ख़ून का मतलब
    पैसे की कीमत हम समझते हैं
    क्या है पक्ष में विपक्ष में क्या है,हम समझते हैं
    हम इतना समझते हैं
    कि समझने से डरते हैं और चुप रहते हैं।

    चुप्पी का मतलब भी हम समझते हैं
    बोलते हैं तो सोच-समझकर बोलते हैं हम
    हम बोलने की आजादी का
    मतलब समझते हैं
    टुटपुंजिया नौकरी के लिये
    आज़ादी बेचने का मतलब हम समझते हैं
    मगर हम क्या कर सकते हैं
    अगर बेरोज़गारी अन्याय से
    तेज़ दर से बढ़ रही है
    हम आज़ादी और बेरोज़गारी दोनों के
    ख़तरे समझते हैं
    हम ख़तरों से बाल-बाल बच जाते हैं
    हम समझते हैं
    हम क्योंबच जाते हैं,यह भी हम समझते हैं।

    हम ईश्वर से दुखी रहते हैं अगर वह
    सिर्फ़ कल्पना नहीं है
    हम सरकार से दुखी रहते हैं
    कि समझती क्यों नहीं
    हम जनता से दुखी रहते हैं
    कि भेड़ियाधसान होती है।

    हम सारी दुनिया के दुख से दुखी रहते हैं
    हम समझते हैं
    मगर हम कितना दुखी रहते हैं यह भी
    हम समझते हैं
    यहां विरोध ही बाजिब क़दम है
    हम समझते हैं
    हम क़दम-क़दम पर समझौते करते हैं
    हम समझते हैं
    हम समझौते के लिये तर्क गढ़ते हैं
    हर तर्क गोल-मटोल भाषा में
    पेश करते हैं,हम समझते हैं
    हम इस गोल-मटोल भाषा का तर्क भी
    समझते हैं।

    वैसे हम अपने को किसी से कम
    नहीं समझते हैं
    हर स्याह को सफे़द और
    सफ़ेद को स्याह कर सकते हैं
    हम चाय की प्यालियों में
    तूफ़ान खड़ा कर सकते हैं
    करने को तो हम क्रांति भी कर सकते हैं
    अगर सरकार कमज़ोर हो
    और जनता समझदार
    लेकिन हम समझते हैं
    कि हम कुछ नहीं कर सकते हैं
    हम क्यों कुछ नहीं कर सकते हैं
    यह भी हम समझते हैं।

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